सभ्यता एक पिंजड़े की तरह है जिसके भीतर मानवीय कबीलेपन का स्वच्छंद कबूतर कैद है। यह कबूतर पिंजड़े के अंदर है तो दबा है, शांति का द्योतक है लेकिन व्याकुल भी है। जिस दिन पिंजड़े का दरवाज़ा खुलता है, ये कबूतर अपना असली रंग दिखाता है। ये शांति का नहीं बेलगाम उड़ान का प्रतीक बनता है। इसके पंख इसकी नियति तक इसे ले के जाते हैं। इसका असली चटख खुला बेपरवाह रूप सामने आता है।

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